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भारत के संविधान की प्रस्तावना या उद्देशिका – परिचय

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हमारे संविधान की उद्देशिका, विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र और हमारे राष्ट्र – स्वतंत्र भारत के सर्वोच्च कानून, हमारे संविधान की आत्मा का स्वरूप है। वह संविधान का एक अभिन्न अंग है और संविधान में निहित  उन उदात्त भावनाओं और दर्शन को प्रतिबिंबित करती है, जो अनंत काल से भारतवासीयों के मूलभूत आदर्शों, संकल्पों और आकांक्षाओं पर आधारित हैं ।

संविधान की प्रस्तावना या उद्देशिका का प्रारूप 

हम, भारत के लोग, भारत को एक 1[संर्पूण प्रभुत्व-संपन्न
समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य] बनाने के
लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को :

सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय,

विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म
और उपासना की स्वतंत्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर की समता
प्राप्त कराने के लिए,

तथा उन सब में
व्यक्ति की गरिमा और 2[राष्ट्र की एकता
और अखण्डता] सुनिश्चित करने वाली बंधुता
बढ़ाने के लिए

दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख
26 नवंबर, 1949 ई. को एतदद्वारा इस संविधान को
अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

१.  संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 2 द्वारा (3-1-1977 से)। “प्रभुत्व-संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य” के स्थान पर प्रतिस्थापित २. संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 2 द्वारा (3-1-1977 से)  “राष्ट्र की एकता”  के स्थान पर प्रतिस्थापित ।

भारत के संविधान की उद्देशिका या प्रस्तावना
Note: This is not an original image of the Preamble and has been recreated by CulturalSamvaad.com

 उद्देशिका संविधान के अधिकार के स्रोत को परिभाषित करती है 

जब हम उद्देशिका के प्रारम्भिक शब्दों को उसके अंत की ओर आने वाले शब्दों के साथ पढ़ते हैं, तो वे इस प्रकार हैं – हम भारत के लोग एतदद्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं । इस गहन घोषणा का अभिप्राय है कि संविधान के अधिकार का स्रोत भारत के नागरिक ही हैं और समस्त शक्ति एवं सत्ता हम देशवासियों में ही निहित है ।

उद्देशिका भारत की प्रकृति को परिभाषित करती है 

उद्देशिका स्पष्ट शब्दों में भारत की प्रकृति को निर्धारित करती है। हम भारतीयों ने, भारत को एक संर्पूण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी समाजवादी लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने का दृढ़संकल्प किया है। समाजवादी और पंथनिरपेक्ष शब्दों को संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976, के तहत प्रस्तावना में सम्मिलित किया गया था और यह शब्द अपने विभिन्न आशयों के कारण, विवाद का विषय रहे हैं ।

भारत एक संर्पूण प्रभुत्व-संपन्न  राज्य है । हमारे राष्ट्र में एक ऐसी सर्वोच्च तथा परम सत्ता विद्यमान है जिस पर किसी अन्य राज्य या बाहरी शक्ति का नियंत्रण नहीं है । राज्य अपने बाह्य और आंतरिक मामलों का संचालन करने, अपनी क्षेत्रीय अखण्डता की रक्षा करने और किसी भी विषय पर, बिना किसी हस्तक्षेप के कानून बनाने हेतु पूर्णतः स्वतन्त्र है ।

भारत समाजवादी व्यवस्था में की गई, सर्वसाधारण के बीच में समता की अवधारणा का सम्मान करता है । सरकार एवं नागरिक एक ऐसे लोक कल्याणकारी राज्य के निर्माण का प्रयास कर रहे हैं जो देशवासियों में गरीबी और अवसर की असमानता को समाप्त करने में सक्षम हो तथा उचित नीतियों के निर्माण और सार्वजनिक एवं निजी भागीदारी के माध्यम से वंचितों के हितों की रक्षा करे । इसका यह आशय नहीं है कि भारत एक कम्युनिस्ट राष्ट्र है अर्थात साम्यवादी समाजवाद के मॉडल को स्वीकार करता है या निजी उद्योग और संपत्ति के स्वामित्व को हतोत्साहित करता है ।

भारत स्वाभाविक रूप से पंथनिरपेक्ष है । हमारे राष्ट्र का कोई राजकीय पंथ या धर्म नहीं है, परन्तु सभी देशवासियों को धार्मिक स्वतंत्रता का मूल अधिकार प्राप्त है । प्रत्येक नागरिक अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी धर्म में विश्वास करने, उसका पालन एवं प्रचार करने तथा इस प्राचीन एवं बहुलवादी भारतीय सभ्यता के शाश्वत मूल्यों के अनुरूप, अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने के लिए स्वतंत्र है ।

भारत एक लोकतांत्रिक राज्य है । राष्ट्र ने प्रतिनिधिक संसदीय लोकतंत्र की प्रणाली एवं सार्वत्रिक वयस्क मताधिकार की पद्धति को अपनाया है । 18 वर्ष से अधिक आयु के सभी वयस्क नागरिकों को मतदान करने और प्रशासन व्यवस्था के सभी स्तरों पर सरकार चुनने का निर्बाध अधिकार प्राप्त है । भारत की सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी है और संविधान की मूलभूत भावना एवं विधि के अनुरूप कार्य करने के लिए बाध्य है ।

भारत एक गणराज्य है । हमारे राष्ट्र का अध्यक्ष, हमारा  राष्ट्रपति होता है| उन्हे एक संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से, नागरिकों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से, एक निश्चित कार्यकाल के लिए निर्वाचित किया जाता है । यह पद न तो वंशानुगत है और न ही राजतन्त्र शासन प्रणाली के समान केवल जन्म के आधार पर कुछ व्यक्तियों को ही प्राप्त होता है ।

उद्देशिका भारत के लक्ष्यों और उद्देश्यों को परिभाषित करती है 

प्रस्तावना हमारी उन आकांक्षाओं को परिभाषित करती है जिनके आधार पर हम भारत का निर्माण करने में अविरल रूप से प्रयासरत हैं और सरकार तथा न्यायपालिका की कार्यपद्धति के लिए एक समग्र ढाँचा प्रदान करती है ।

हम, भारत के लोगों ने अपने समस्त नागरिकों को और परिणामस्वरूप स्वयं को भी न्याय, स्वतंत्रता और समता प्रदान करने का और हम सभी के बीच बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़संकल्प लिया है ।

न्याय एक सभ्य समाज की आधारशिला होता है । प्रस्तावना में न्याय की व्यापक संकल्पना में सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है ।

सामाजिक न्याय सुनिश्चित कराने हेतु विधि द्वारा सभी प्रकार के शोषण का उन्मूलन आवश्यक है ताकि एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था का निर्माण किया जा सके जिसमें किसी भी भारतीय के साथ जाति, मूलवंश , रंग या वर्ण, पंथ या धर्म, लिंग या जन्म स्थान, आदि के आधार पर भेदभाव न किया जा सके।

आर्थिक न्याय का आशय है कि संघ इस प्रकार राष्ट्रीय संपत्ति का सृजन एवं वितरण करने की दिशा में प्रयास करे जिससे गरीबी का उन्मूलन हो, नागरिकों को उचित आर्थिक अवसर मिलें और आर्थिक रूप से वंचित लोगों का सशक्तिकरण हो |

राजनैतिक न्याय का तात्पर्य है कि हर एक नागरिक को बिना किसी पूर्वाग्रह के देश के लोकतंत्र में भाग लेने का समान अधिकार है ।

प्रत्येक भारतीय को विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता प्रदान की गई है| उचित संवैधानिक सीमाओं का सम्मान करते हुए हर नागरिक को अपनी इच्छानुसार सकारात्मक रूप से जीवन जीने का अधिकार है ।

प्रतिष्ठा और अवसर की समानता नागरिकों को अपनी क्षमता के अनुसार, जीवन में आगे बढ़ने के लिए सशक्त करती है । इस समानता का संरक्षण करने हेतु राज्य एवं सामाजिक संरचना द्वारा नागरिकों के बीच सभी प्रकार के भेदभाव को  विधि द्वारा अवैध किया जाता है ।

व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता हमारे विविध और बहुलवादी देश के सभी नागरिकों के बीच सद्भाव और भाईचारे की भावना को दर्शाती है ।

हमारा कर्तव्य है कि हम हर एक भारतीय की गरिमा की रक्षा करें और उसका परस्पर सम्मान करते हुए, अपने महान देश को अनंत काल तक अक्षुण्ण रखें । भारत के संविधान की उद्देशिका हम, भारत के लोगों का,सारे जहाँ से अच्छे भारत का निर्माण करने में सदैव मार्गदर्शन करती है ।

जय हिन्द ।

Garima Chaudhry Hiranya Citi Tata Topper

Garima Chaudhry

Garima is a corporate leader and the Founder and Editor of Cultural Samvaad. Passionate about understanding India’s ancient 'संस्कृति 'or culture, she believes that using a unique idiom which is native to our land and her ethos, is the key to bringing equitable growth and sustainable change in India.

Deeply interested in Indic Studies, Garima has been a visiting faculty member for over a decade at the Mumbai University and K J Somaiya Institute of Dharma Studies among others. She has taught diploma, graduate and post graduate courses in Development of Religious Thought in India, Hindu Thought and Purakatha, Buddhism and Comparative Mythology among others. She also conducts immersive workshops for various cohorts on appreciating India and her past, her dharmic traditions and her enduring values, stories and symbols.

In her corporate avataar, Garima runs Hiranya Growth Partners LLP, a boutique consulting and content firm based in Mumbai. She is a business leader with over 25 years of experience across Financial Services, Digital Payments and eCommerce, Education and Media at Network18 (Capital18 and Topperlearning), Citibank and TAS (the Tata Group). Garima is an MBA from XLRI, Jamshedpur and an Economics and Statistics Graduate.

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