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दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) – परिचय एवं कथा

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दुर्गा सप्तशती या देवी माहात्म्य क्या है?

दुर्गा सप्तशती, अपराजिता, दिव्य आदिशक्ति को समर्पित, मार्कण्डेय पुराण (अध्याय ८१ – ९३) के अन्तर्गत प्राप्त होने वाला एक सनातन और उदात्त हिन्दू ग्रन्थ है । इसमें वर्णित मनमोहक एवं प्रेरणादायक कथायें तथा कालातीत प्रतीक भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की आधारशिला हैं । दुर्गा सप्तशती को ‘चण्डी पाठ’ या केवल ‘चण्डी’ के नाम से भी जाना जाता है । जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है, इस कृति के प्रचलित संस्करण में सात सौ श्लोक हैं जो तेरह अध्यायों में विभाजित हैं । इन अध्यायों में तीन प्रमुख आख्यान पाये जाते हैं । भक्तगण इस ग्रन्थ का पाठ नियमित रूप से करते हैं । नवरात्रि में चण्डी के श्रवण एवं उस पर मनन करने का विशेष महत्त्व माना गया है ।

दुर्गा सप्तशती सम्भवतः, एक सर्वशक्तिसम्पन्न, सर्वोपरि, सर्वेश्वरी देवी को सम्पूर्ण रूप से समर्पित, विश्व की सबसे प्राचीन कृति है । वर्तमान काल में, जिस स्वरूप में माँ दुर्गा को भारत और विश्व में पूजा जाता है, वह स्वरूप प्रायः इस शास्त्र से ही प्रेरित जान पड़ता है । विद्वानों का मानना है कि जब दुर्गा सप्तशती की रचना हुयी थी, तब इसके रचयिता/रचयिताओं ने उस समय भारत में प्रचलित, देवी-उपासना की सहस्राब्दियों पुरानी परम्पराओं एवं अनेक कथाओं को समन्वित और सुस्पष्ट रूप देने का प्रयास किया था ।

दुर्गा सप्तशती की संक्षिप्त कथा

अथ श्री दुर्गा सप्तशती

महान ऋषि मार्कण्डेयजी ने अपने शिष्यों को देवी माहात्म्य सुनाना प्रारम्भ किया ।

Watch and Read : Devi Mahatmya in English

राजा सुरथ और समाधि वैश्य की व्यथा

प्राचीन काल में, सुरथ नाम के एक शक्तिशाली और धर्मनिष्ठ राजा थे । वे एक विशाल साम्राज्य के अधिपति थे । एक बार उनका पराक्रमी कोलाविध्वंसी क्षत्रियों से युद्ध हुआ जिसमें वे परास्त हो गये । उनके धूर्त मंत्रियों ने स्थिति का अनुचित लाभ उठाते हुये, राज्य के कोश को हथिया लिया । राजा सुरथ का प्रभुत्व नष्ट हो गया । निराश होकर वे घने वन में चले गये । चलते-चलते, वे विप्रवर मुनि मेधा के रमणीय एवं शान्त आश्रम में पहुँचे जहाँ ऋषि के शिष्यों ने उनका आदर-सत्कार किया परन्तु उस शान्त वातावरण में भी उनका मन उद्विग्न ही था । वे अपने राज्य, अपनी प्रजा एवं अपने प्रधान हाथी की कुशलता को लेकर व्यथित थे । आश्रम में उनकी भेंट समाधि नामक एक धनी व्यापारी से हुयी । समाधि के दुष्ट परिवार ने उनकी सम्पत्ति हड़प ली थी और उन्हें बेघर कर दिया था । दुखी होकर, राजा के समान, समाधि ने भी वन में आश्रय लिया था परन्तु वे भी अपने परिवार की कुशलता के बारे में सोच कर निरन्तर व्याकुल रहते थे ।

इस प्रकार सुरथ और समाधि दोनों ही अज्ञानियों की भाँति उन लोगों के प्रति प्रेम से आसक्त थे, जिन्होंने उनके साथ दुराचार कर, उनका परित्याग कर दिया था । भावनाओं के इस भ्रमजाल के रहस्य को समझने हेतु वे दोनों मुनि मेधा की सेवा में उपस्थित हुये ।

ऋषि मेधा ने उन्हें समझाया कि उनका मोह वास्तव में माया के शाश्वत सिद्धांत का रूप मात्र था । अनादि काल से इस ब्रह्माण्ड की स्वाभाविक व्यवस्था बनाये रखने हेतु, देवी महामाया यह सुनिश्चित करती हैं कि सभी जीव जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म के अनन्त भँवर चक्र में फँसे रहें ।

सुरथ के अनुरोध पर, ऋषि ने उन्हें बताया कि भगवती नित्य एवं अजन्मा होते हुये भी, समय-समय पर प्रकट होती हैं और देवी महामाया के प्रथम चरित्र की व्याख्या की ।

प्रथम चरित्र: देवी महामाया, विष्णु एवं मधु-कैटभ वध (अध्याय १)

Vishnu slays the demons Madhu and Kaitabha to become Madhusudana
Vishnu slays the demons Madhu and Kaitabha from a Devi Mahatmya Series – Attributed to Guler – Image Courtesy : Asian Art Museum

बात उस समय की है जब महाप्रलय के पश्चात, हमारे ब्रह्माण्ड के जीवन में एक कल्प का अन्त हो चुका था । सम्पूर्ण जगत जलमग्न था । भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में विश्राम कर रहे थे एवं ब्रह्माजी उनकी नाभि से निकले कमल पर शान्त भाव से आसीन थे । उस समय विष्णुजी के कानों से निकले मैल से मधु और कैटभ नामक दो असुर उत्पन्न हुये । वे भयंकर असुर ब्रह्माजी का वध करने को आतुर थे और इस इच्छा से उनकी ओर अग्रसर हुये । व्याकुल ब्रह्माजी ने एकाग्रचित्त होकर उन देवी योगनिद्रा का स्तवन किया, जो जनार्दन की आँखों में निवास कर रही थीं । महामाया अनादि और अनन्त हैं और सभी चर-अचर प्राणियों को भ्रमित करती हैं ।

प्रजापति की प्रार्थना से प्रसन्न होकर, वह सर्वशक्तिमान, अजन्मा देवी, नारायण के हृदय एवं इन्द्रियों से बाहर निकल कर ब्रह्माजी के समक्ष प्रकट हुयीं और ब्रह्माजी को आशीर्वाद दिया ।

योगनिद्रा से जागने के पश्चात, विष्णुजी ने पाँच हजार वर्षों तक मधु और कैटभ के साथ भीषण युद्ध किया । अंततः, देवी महामाया ने असुरों को भ्रमित कर, उन्हें विश्वास दिला दिया कि वे अजेय हैं । उन्होंने श्रीहरि को भी असीम शक्ति प्रदान की ।

अहंकार के मद में चूर, उन दैत्यों ने विष्णुजी से कहा- ‘हमसे वर माँगो।’ जगन्नाथ ने मधु और कैटभ से अनुरोध किया कि वे उनके द्वारा नष्ट हो जायें । दोनों अभिमानी दैत्य अपने ही जाल में फँस गये । उन्होंने विष्णुजी से याचना की कि वे उनका वध किसी ऐसे स्थान पर करें जहाँ पर जल न हो । तब श्रीहरि ने उनके मस्तक अपनी जंघा पर रख, अपने सुदर्शन चक्र से उनके शीश धड़ से अलग कर दिये । मधु और कैटभ का अन्त हो गया । सृष्टि का निर्माण पुनः प्रारम्भ हो गया ।

इस प्रकार देवी माहात्म्य के प्रथम अध्याय में ऋषि मेधा द्वारा सुरथ और समाधि को सुनाया गया पहला प्रकरण समाप्त होता है ।

मध्यम चरित्र: महिषासुरमर्दिनी (अध्याय २ – ४)

ऋषि मेधा ने ब्रह्माण्ड की रक्षा हेतु की गयी देवी की दिव्य लीलाओं का वर्णन करते हुये देवी महिषासुरमर्दिनी के मध्यम चरित्र की कथा आरम्भ की ।

आदि काल में, शक्तिशाली असुर महिष और उसकी विशाल सेना ने इन्द्र आदि देवताओं को सौ वर्ष तक चले घोर संग्राम में परास्त कर दिया । महिषासुर इन्द्र का सिंहासन छीन, स्वयं ही इन्द्र बन बैठा । हारे हुये देवताओं ने विष्णु और शिव से सहायता के लिये प्रार्थना की । विष्णु और शिव दैत्यों पर क्रुद्ध हो गये ।

कुपित त्रिदेव एवं अन्य सभी देवताओं से महान तेज प्रकट हुआ । यह अतुलनीय तेज, एक विशाल पुंज में एकत्रित होकर एक ज्वलन्त पर्वत के समान प्रतीत होने लगा । तदनन्तर यह ऊर्जा अद्वितीय देवी – आदिशक्ति में परिणत हो गयी । विष्णु, शिव, ब्रह्मा एवं सभी देवताओं ने देदीप्यमान जगत जननी माँ को असंख्य दिव्य अस्त्र-शस्त्र और बहुमूल्य रत्न भेंट किये ।

Durga Devi defeats Mahishasura's Army - Mahishasuramardani Painting
Durga Devi defeats Mahishasura’s Army – Folio from a Dispersed Devi Mahatmya Series attributed to Guler – Image Courtesy – Brooklyn Museum

नाना प्रकार के रत्नों से सुसज्जित शक्ति ने उच्च गर्जना की । उस गर्जना की प्रतिध्वनि से समस्त संसार डोलने लगा । उनका अट्टहास सुन, महिषासुर की सेना ने उन पर आक्रमण कर दिया । देवी ने अपने वाहन सिंह के साथ मिलकर, अपने अस्त्र-शस्त्र से असुर सेना को छिन्न-भिन्न कर दिया । निडर एवं क्रोधित महिष ने भैंसे का रूप धारण कर अपने पैर पटके । उसके बल से धरती डगमगाने लगी । तदनन्तर उस शूरवीर योद्धा ने भगवती देवी एवं उनके गणों पर धावा बोल दिया । तीन नयनों वाली, उग्र देवी और महिषासुर ने कई वर्षों तक धरती पर और आकाश में भयंकर युद्ध किया ।

अन्त में कुपित देवी ने महिषासुर का शरीर अपने चरणों के तले दबा, उसका गला अपने शूल से भेद दिया । महिष का आधा धड़ ही भैंस रूपी तन से बाहर आ पाया था कि तभी आदिशक्ति ने उसका मस्तक काट गिराया और महिषासुरमर्दिनी के नाम से विख्यात हो गयीं ।

देवता अत्यंत प्रसन्न हो गये और उन्होंने देवी दुर्गा का स्तवन किया । महिषासुरमर्दिनी के इस दिव्य अवतार में आदिशक्ति ने देवताओं को वरदान दिया कि वे हर युग में एवं हर काल में उनकी रक्षा करने हेतु अवतरित होती रहेंगी ।

Durga annihilates Mahishasura and becomes Mahishasura mardini – Kota, India – 18th cent. CE – Image Courtesy : Philadelphia Museum of Art

इस प्रकार देवी माहात्म्य के द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ अध्यायों में ऋषि मेधा द्वारा सुरथ और समाधि को सुनाया गया दूसरा प्रकरण समाप्त होता है ।

उत्तर चरित्र: देवी अम्बिका, देवी काली, सप्त मातृका एवं शुम्भ-निशुम्भ और रक्तबीज का वध (अध्याय ५ – ११)

तत्पश्चात ऋषि मेधा ने दुर्गा सप्तशती के उत्तर चरित्र का वर्णन किया और देवताओं के स्मरण करने पर, माँ भगवती केअपने वरदान के अनुरूप, देवी अम्बिका के रूप में अवतरित होने की कथा सुनायी ।

पूर्व काल में देवताओं और असुरों के बीच घोर संग्राम हुआ । देवराज इन्द्र की सेना शुम्भ और निशुम्भ की शक्तिशाली सेना से परास्त हो गयी । शुम्भ और निशुम्भ ने देवताओं के सभी अधिकार छीन लिये एवं समस्त ब्रह्माण्ड पर राज करने लगे । पराजित तथा अधिकारहीन देवताओं ने कैलाश पर्वत पर जाकर माँ पार्वती से सहायता हेतु प्रार्थना की ।

माता पार्वती ने देवताओं की रक्षा करने के लिये देवी अम्बिका का मनोहर रूप धारण किया और गिरिराज हिमालय पर निवास करने लगीं । एक दिन, चण्ड और मुण्ड नाम के दो असुरों ने देवी दुर्गा के इस परम तेजस्वी रूप को देखा । वे तुरन्त अपने स्वामी शुम्भ और निशुम्भ के पास गये, देवी के आकर्षक रूप का गुणगान किया तथा अपने सामर्थ्यवान राजाओं को उस दिव्य देवी को अपने अधीन करने के लिये उत्तेजित किया ।

शुम्भ और निशुम्भ ने सुग्रीव नाम के एक बुद्धिमान दैत्य को दूत बनाकर देवी के पास भेजा जिससे वह उस उत्तम स्त्री को उनके महल में आने का आमन्त्रण दे सके तथा दोनों में से किसी एक भाई से विवाह करने के लिये सहमत कर सके । देवी अम्बिका ने शुम्भ और निशुम्भ का प्रस्ताव यह कह कर ठुकरा दिया कि उन्होंने यह प्रण लिया है कि वे केवल उसी से विवाह करेंगी जो उन्हें युद्ध में पराजित करेगा । जब उन दोनों अहंकारी भाइयों को पता चला कि एक साधारण स्त्री ने उनके परिणय के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है, तो उनके क्रोध की सीमा न रही ।

उन्होंने तुरन्त अपने वीर सेनापति धूम्रलोचन को बुलाया और उसे अपनी विशाल सेना के साथ जाकर देवी का बलपूर्वक हरण कर, वहाँ लाने का आदेश दिया । धूम्रलोचन देवी अम्बिका के समक्ष एक पल भी नहीं टिक सका । उनके ‘हुं’ शब्द के उच्चारण मात्र से ही वह भस्म हो गया । क्रोधित देवी और उनके विकराल वाहन ने कुछ ही क्षणों में शेष असुर सेना का संहार कर दिया ।

धूम्रलोचन की हार से स्तब्ध होकर, शुम्भ और निशुम्भ ने अम्बिका देवी से युद्ध करने के लिये चण्ड और मुण्ड के नेतृत्व में एक और विशाल सेना भेजी । वे मूर्ख असुर, देवी को बंदी बनाने हेतु, उनकी ओर दौड़े । क्रोध से देवी का मुख काला पड़ गया और उनके माथे से विकरालमुखी कालिका देवी प्रकट हुयीं । माँ काली युद्धभूमि में कूद पड़ीं और सम्पूर्ण असुर सेना को मार गिराया । उन्होंने कुछ असुरों को निगल लिया, कुछ को कुचल दिया और शेष असुरों को बुरी तरह घायल कर दिया । क्रुद्ध चण्ड और मुण्ड ने उन पर अनगिनत बाणों और अन्य अस्त्र-शस्त्रों से हमला किया । तदनन्तर, रोष से भरी, रौद्र रूप धारण कर, देवी कालिका ने चण्ड का शीश अपनी चमकती हुयी तलवार से काट डाला । मुण्ड का अन्त भी उन्हीं के हाथों से हुआ । विजयी माँ काली ने चण्ड और मुण्ड के मस्तक देवी चण्डिका को अर्पित किये । तब से वे संसार में चामुण्डा के नाम से प्रसिद्ध हो गयीं ।

प्रतिशोध लेने की भावना से ओत-प्रोत, शुम्भ और निशुम्भ ने अपनी सम्पूर्ण सेना को देवी अम्बिका से युद्ध करने हेतु कूच करने का आदेश दिया । इसी बीच, देवताओं ने अपनी शक्तियों का आवाहन किया । असीमित बल और पराक्रम से सम्पन्न, ये भव्य एवं निडर मातृकायें – ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही और ऐन्द्री, रणभूमि में चण्डिका एवं चामुण्डा के साथ युद्ध करने हेतु तत्पर हो गयीं । देवी चण्डिका ने निरर्थक रक्तपात को रोकने हेतु एक अन्तिम प्रयास किया । उन्होंने भगवान शिव को शान्ति दूत बनाकर शुम्भ और निशुम्भ के पास भेजा परन्तु मदान्ध होकर उन भाइयों ने देवी अम्बिका अर्थात शिवदूती का प्रस्ताव ठुकरा दिया ।

Goddess Durga slaying Nishumbha
Goddess Durga slaying Nishumbha – Folio from Durga Saptashati – 19th Cent. CE – Rajasthan India – Public Domain

तदनन्तर असुरों एवं मातृकाओं का घनघोर संग्राम हुआ । जब असुर लड़खड़ाने लगे, तो रक्तबीज नामक एक भयंकर दानव आगे आया । मातृकाओं ने अपने प्रहार और प्रचण्ड कर दिये परन्तु रक्तबीज कोई साधारण दानव नहीं था । जैसे ही उसके रक्त की एक भी बूँद पृथ्वी पर गिरती थी, वैसे ही उसी के समान एक और भयानक एवं विशाल दानव उत्पन्न हो जाता था । देखते ही देखते, सम्पूर्ण रणभूमि रक्तबीज रूपी दानवों से भर गयी । यह वीभत्स दृश्य देखकर देवी चामुण्डा ने अपनी जिह्वा बहुत लम्बी फैला ली तथा माँ चण्डिका रक्तबीज पर निरन्तर आघात करने लगीं । उस विशाल दानव के रक्त की हर बूँद माँ काली की जिह्वा पर गिरने लगी । जैसे ही गिरे हुये रक्त बिन्दु से कोई भी दैत्य प्रकट होता था, वैसे ही विकराल काली तुरन्त उसको अपना ग्रास बना लेती थीं । धीरे-धीरे रक्तबीज के शरीर से रक्त क्षीण हो गया एवं उस भयानक दानव का अन्त हो गया । उसके अन्त से जहाँ एक ओर मातृगण हर्षित हो उठीं एवं देवताओं ने राहत की साँस ली, वहीं दूसरी ओर असुर राजा और क्रुद्ध हो गये ।

उन्होंने देवी और मातृकाओं पर भीषण आक्रमण कर दिया । चारों ओर भयानक स्वर गूँजने लगे और तबाही मच गयी । युद्ध की समाप्ति अब समीप थी । निशुम्भ और चण्डिका के बीच घोर संग्राम हुआ । अंततः, देवी ने अपने तीव्र शूल से उसका हृदय छलनी कर दिया । निशुम्भ की छाती से एक और महापराक्रमी दैत्य उत्पन्न हुआ, जिसे भी उग्र देवी ने अपने देदीप्यमान खड्ग से मार गिराया । इस प्रकार भयानक निशुम्भ का अन्त हो गया ।

अपने प्रिय भ्राता की मृत्यु से शोकाकुल शुम्भ ने देवी अम्बिका को मातृकाओं के अवलम्ब के बिना, अकेले ही युद्ध करने की चुनौती दी । देवी ने उसकी चुनौती स्वीकार कर ली । परिणामतः, समस्त मातृकायें, जो वास्तव में आदिशक्ति का ही रूप थीं, माँ अम्बिका में विलीन हो गयीं । देवी और असुरराज शुम्भ के बीच भयंकर द्वन्द्व युद्ध हुआ । उन्होंने धरती और गगन दोनों में संग्राम किया । उन्होंने घातक हथियारों से रण किया और मल्ल युद्ध भी किया । अन्त में, दुर्गा ने अपने तीक्ष्ण शूल से शुम्भ का वध कर दिया और उसका निर्जीव शरीर भयानक ध्वनि के साथ पृथ्वी पर आ गिरा । असुरों का विध्वंस हो गया और ब्रह्माण्ड का संतुलन पुनः स्थापित हो गया ।

प्रफुल्लित एवं भयमुक्त देवताओं ने माँ चण्डिका, माँ काली तथा अन्य मातृकाओं का वन्दन कर, उनके प्रति अपना असीम आभार व्यक्त किया । उन्होंने देवी अर्थात सर्वोच्च शक्ति की स्तुति की एवं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की सृष्टि, पालन और विनाश के मूल कारण के रूप में उनको नमन किया । देवताओं ने विश्व की सभी स्त्रियों को उन्हीं का प्रतिरूप भी बताया । प्रसन्न होकर सनातन देवी ने उन्हें आशीर्वाद दिया और यह वचन भी दिया कि सृष्टि में धर्म एवं ऋत की स्थापना करने हेतु, वे हर युग और हर काल में अवतरित होती रहेंगी ।

देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य।

प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य॥

दुर्गा सप्तशती ११.३

भावार्थ: शरणागतों की पीड़ा दूर करने वाली देवि! हम पर प्रसन्न होओ । सम्पूर्ण जगत की माता ! प्रसन्न होओ । विश्वेश्वरि! विश्व की रक्षा करो । देवि! तुम्हीं सम्पूर्ण चराचर ब्रह्माण्ड की अधीश्वरी हो ।

इस प्रकार पाँचवें से ग्यारहवें अध्यायों में ऋषि मेधा द्वारा सुरथ और समाधि को सुनाया गया, देवी माहात्म्य का तीसरा प्रकरण समाप्त होता है ।

दुर्गा सप्तशती का शाश्वत वरदान और फलश्रुति (अध्याय १२ – १३)

दुर्गा सप्तशती के बारहवें अध्याय में, प्रज्ञावान ऋषि मेधा ने स्वयं देवी द्वारा देवताओं को बताये गये इस उत्तम ग्रन्थ के पाठ के माहात्म्य का वर्णन किया । तत्पश्चात उन्होंने राजा सुरथ और समाधि को देवी महामाया की शरण में जाने का परामर्श दिया ।

देवी माहात्म्य के प्रचलित संस्करण के तेरहवें और अन्तिम अध्याय में ऋषि मार्कण्डेय बताते हैं कि देवी के अतुल पराक्रम की कथायें सुनने के बाद, सुरथ और समाधि ऋषि मेधा का आश्रम छोड़ कर, एक नदी के तट पर जा कर बस गये । वहाँ वे देवी को प्रसन्न करने के लिये उनकी आराधना करने लगे और कठोर तपस्या में लीन हो गये ।

Devatas pray to Devi Durga, Kali and the Matrikas
Devatas pray to Devi Durga, Kali and the Matrikas -Folio from an early 19th cent. Devi Mahatmya – Kangra, India

 

उनकी निष्ठा और भक्ति से संतुष्ट होकर देवी स्वयं उनके समक्ष प्रकट हुयीं और उनसे वर माँगने को कहा । सुरथ ने अपने शत्रुओं को नष्ट कर, अपना राज्य पुनः प्राप्त करने हेतु असीम शक्ति की याचना की । उन्होंने अगले जन्म में एक अविनाशी राज्य एवं अनन्त ख्याति का वरदान भी माँगा । सांसारिक मोह-माया से विरक्त हो चुके समाधि ने देवी से मोक्ष के मार्ग का ज्ञान प्राप्त करने की प्रार्थना की । आदिशक्ति, पराशक्ति माँ अम्बिका, उन दोनों को मनोवांछित वरदान देकर, वहाँ से अन्तर्धान हो गयीं ।

इस प्रकार, विवेकी एवं परम ज्ञानी ऋषि मार्कण्डेय द्वारा विरचित देवी माहात्म्य का समापन हुआ ।

सर्वशक्तिमान एवं सर्वव्यापी माँ दुर्गा के चरित्र को प्रतिपादित करने वाला यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ, प्रत्येक युग व प्रत्येक काल में मानव मात्र का मार्गदर्शन करने हेतु प्रासंगिक है ।

Select References:

  1. दुर्गा सप्तशती. गीता प्रेस.
  2. Allchin, Bridget (1997). Origins of a Civilization: The Prehistory and Early Archaeology of South Asia. New York: Viking.
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  7. Parpola, A. (2015). The roots of Hinduism: The early Aryans and the Indus civilization. New York: Oxford University Press.
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  10. Thapar, Romila (2004). Early India: From the Origins to AD 1300. University of California Press.

Garima Chaudhry - Founder and Editor - CulturalSamvaad.com

Garima Chaudhry

Garima Chaudhry is the Founder and Editor of Cultural Samvaad and Founder and Managing Partner of Hiranya Growth Partners LLP, a boutique consulting and content advisory firm based in Mumbai.

A scholar-practitioner with deep roots in Indic Studies, Garima has been a visiting faculty member for over a decade at Mumbai University and KJ Somaiya Institute of Dharma Studies, among other institutions. She has taught diploma, graduate and post-graduate courses in Development of Religious Thought in India, Hindu Thought, Bhartiya Purakatha, Buddhism and Comparative Mythology. She regularly conducts immersive workshops on India's dharmic traditions, civilisational heritage, enduring values, stories and symbols for diverse cohorts across institutions and organisations.

Garima brings over 25 years of leadership experience across financial services, digital payments, eCommerce, education and media. She began her career as a TAS Officer with the Tata Group, working across functions and sectors including FMCG and Power. At Citibank, she held progressive leadership roles culminating as Head of Strategy, Citi South Asia — working with the CEO, South Asia and Asia Pacific office on near and long-term strategic initiatives. Garima earlier led the business team for Digital Marketing, ePayments and eCommerce across India, building one of the country's early digital payment platforms. As Director at Capital18 (Network18), she led investment transactions and managed portfolio companies across focus sectors. She also served as CEO of GreyCells18 (Topperlearning and Topper TV), where she turned around and scaled the company to a 150-member team and built one of India's foremost supplementary education platforms.

Garima holds an MBA from XLRI Jamshedpur and a Bachelor's degree in Economics and Statistics from DAV College, Kanpur.Her scholarly interest in India's ancient संस्कृति — culture — and her conviction that a native idiom rooted in India's own ethos is essential to equitable growth and sustainable change, is the founding impulse behind Cultural Samvaad.

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