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प्राचीन काल में मधु और कैटभ नामक दो दैत्य हुये थे । उनके अन्त की लोकप्रिय एवं रोचक कथा, अनेक पुराणों एवं महाभारत में पायी जाती है । उल्लेखनीय है कि मधु का वध करने से ही भगवान विष्णु एवं श्रीकृष्ण ‘मधुसूदन’ भी कहलाते हैं । इस लेख में हमने मार्कण्डेय पुराण के अन्तर्गत देवी माहात्म्य के प्रथम अध्याय एवं देवी भागवत पुराण के प्रथम स्कन्ध में संलग्न कथाओं का वर्णन किया है ।
भगवती महामाया की अनुकम्पा से विष्णु द्वारा मधु और कैटभ के अन्त की कथा – दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय से उद्धृत
बात उस समय की है जब हमारे ब्रह्माण्ड के जीवन में एक कल्प का अन्त हो चुका था । सम्पूर्ण जगत जलमग्न था । भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में विश्राम कर रहे थे एवं ब्रह्माजी उनकी नाभि से निकले कमल पर शान्त भाव से आसीन थे । उस समय विष्णुजी के कानों से निकले मैल से मधु और कैटभ नामक दो असुर उत्पन्न हुये । वे भयंकर असुर ब्रह्माजी का वध करने को आतुर थे और इस इच्छा से उनकी ओर अग्रसर हुये । व्याकुल ब्रह्माजी ने एकाग्रचित्त होकर उन देवी योगनिद्रा का स्तवन किया, जो जनार्दन की आँखों में निवास कर रही थीं ।** महामाया अनादि और अनन्त हैं और सभी चर-अचर प्राणियों को भ्रमित करती हैं ।
प्रजापति की प्रार्थना से प्रसन्न होकर, वह सर्वशक्तिमान, अजन्मा देवी, नारायण के हृदय एवं इन्द्रियों से बाहर निकल कर ब्रह्माजी के समक्ष प्रकट हुयीं और ब्रह्माजी को आशीर्वाद दिया ।
योगनिद्रा से जागने के पश्चात, विष्णुजी ने पाँच हजार वर्षों तक मधु और कैटभ के साथ भीषण युद्ध किया । अंततः, देवी महामाया ने असुरों को भ्रमित कर, उन्हें विश्वास दिला दिया कि वे अजेय हैं ।
अहंकार के मद में चूर, उन दैत्यों ने विष्णुजी से कहा- ‘हमसे वर माँगो।’ जगन्नाथ ने मधु और कैटभ से अनुरोध किया कि वे उनके द्वारा नष्ट हो जायें । दोनों अभिमानी दैत्य अपने ही जाल में फँस गये । उन्होंने विष्णुजी से याचना की कि वे उनका वध किसी ऐसे स्थान पर करें जहाँ पर जल न हो । तब श्रीहरि ने उनके मस्तक अपनी जंघा पर रख, अपने सुदर्शन चक्र से उनके शीश धड़ से अलग कर दिये । मधु और कैटभ का अन्त हो गया । सृष्टि का निर्माण पुनः प्रारम्भ हो गया ।

भगवती योगमाया की अनुकम्पा से विष्णु द्वारा मधु और कैटभ के अन्त की कथा – देवी भागवत पुराण के प्रथम स्कन्ध से उद्धृत
देवी भागवत पुराण के प्रथम स्कन्ध के छठे से नवें अध्यायों में इस आख्यान का और विस्तारपूर्वक वर्णन है । मधु और कैटभ के जन्म की कथा में कोई विशेष अन्तर नहीं है । वे दोनों पराक्रमी दैत्य विष्णुजी के कानों के मैल से उत्पन्न होकर महासागर में भ्रमण करने लगे । तत्पश्चात उन्होंने एक हजार वर्षों तक भगवती देवी की उपासना की जिन्होंने मधु और कैटभ को इच्छा मृत्यु का वरदान देते हुये आश्वस्त किया कि कोई भी देवता या दानव उनका वध करने में सक्षम नहीं होगा । अभिमान में चूर, उन दैत्यों ने ब्रह्माजी पर आक्रमण कर दिया । व्यथित ब्रह्माजी ने शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में लीन विष्णुजी से सहायता के लिये प्रार्थना की । असफल होने पर उन्होंने भगवती योगमाया का स्तवन किया जिन्होंने हरि को अपनी माया से मुक्त कर दिया । जगन्नाथ ने मधु और कैटभ से पाँच हज़ार वर्ष तक युद्ध किया । उन्हें परास्त न कर पाने पर, खिन्न होकर, हरि ने देवी की उपासना की । प्रसन्न देवी ने विष्णुजी के साथ एक योजना बनायी । योजनानुसार, अम्बिका ने उन मतवाले दैत्यों को मोह में डाल दिया । श्रीहरि ने असुरों से कहा – ‘मुझसे इच्छानुसार वर माँगो।’ अभिमानी मधु और कैटभ ने कहा – ‘हम याचक नहीं हैं । हम तो दानवीर हैं । हम ही आप को वर दे देंगे ।’ नारायण ने उनसे याचना की – ‘मेरे हाथों से मृत्यु स्वीकार करो ।’ भगवती के माया पाश से मोहित होकर मधु और कैटभ अपनी ही बातों से ठगे गये । भगवान विष्णु ने उन दोनों दैत्यों के मस्तकों को अपनी जांघों पर रखकर, सुदर्शन चक्र से काट डाला । तमस रूपी मधु और कैटभ का अस्तित्व समाप्त हो गया ।
मधु और कैटभ की कथा हमें याद दिलाती है कि देवी महामाया का तेज सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है। वे नित्य, सत-असत स्वरूप देवी हमें अपनी माया रूपी अंधेरे से निरन्तर भ्रमित करती हैं और वे ही नित्य ज्ञान के प्रकाश से हमारा साक्षात्कार करवाती हैं ।
मधु और कैटभ की कथा का आशय
यह ध्यान देने योग्य है कि मधु और कैटभ, स्वयं श्री विष्णु के कानों के मैल से उत्पन्न हुये थे । इसी प्रकार हमारी तामसिक प्रवृत्तियों का जन्म भी हमारे तन और मन में जमे हुये मैल से ही होता है । वास्तव में हमारी आसुरी वृत्तियाँ तथा अवगुण जैसे आलस्य, क्रोध, अहंकार, लोभ और विनाशकारी या हिंसक स्वभाव ही हमारे चित्त का मैल हैं । यदि हम इन प्रवृत्तियों को नियंत्रित करने में असमर्थ रहते हैं, तो ये अवगुण हमें मनुष्य से दैत्य योनि की ओर ले जाते हैं ।
यह प्राचीन कथा मानवमात्र को सीख देती है कि हमें अपने अन्तर्मन से माया का पर्दा हटाने हेतु सदैव प्रयासरत रहना होगा जिससे कि हम अपने अन्दर के असुरों पर विजय प्राप्त कर सकें ।
टिप्पणी :
** ब्रह्माजी का यह स्तवन ‘तन्त्रोक्त रात्रिसूक्तम्’ के नाम से प्रसिद्ध है एवं उपासक इसके पाठ को अत्यन्त लाभकारी मानते हैं ।
त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका ।
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता ॥
अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः ।
त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा ॥
त्वयैव धार्यते सर्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत् ।
त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा ॥
विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने ।
तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये ॥
महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः ।
महामोहा च भवती महादेवी महेश्वरी ॥






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