Cultural Samvaad| Indian Culture and Heritage

सोमनाथ – आस्था का प्रतीक: डॉ. राजेंद्र प्रसाद का भाषण, ११ मई १९५१

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संपादकीय टिप्पणी

आम तौर पर सोमनाथ की भारत में स्थित दिव्य बारह ज्योतिर्लिङ्गों में गणना प्रथम स्थान पर की जाती है । प्रसिद्ध संस्कृत स्तोत्र – द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग स्तोत्रम् में इसका उल्लेख सबसे पहले प्राप्त होता है।  ज्योतिर्लिङ्ग वे स्वयंभू लिङ्ग हैं जो स्वयं रुद्र-शिव का ही प्रतीकात्मक रूप हैं और भक्तों के हृदय में इनका विशेष महत्व है।

द्वादश ज्योतिर्लिङ्गों की सम्पूर्ण जानकारी 

चंद्रमा के स्वामी – श्री सोमनाथ भारत के पश्चिमी तट पर गुजरात के प्रभास क्षेत्र में स्थित हैं । इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह क्षेत्र दो सहस्राब्दियों (या उससे भी अधिक) से पवित्र रहा है । भारत के कई अन्य पवित्र स्थलों की तरह, इस मंदिर का इतिहास भी उतार-चढ़ाव से भरा रहा है और यह लुटेरों और समय दोनों के प्रकोप से निरंतर जूझता रहा है । फिर भी यह बार-बार आशा के एक अनंत प्रतीक के रूप में पुनर्जीवित होता रहा है। कुख्यात महमूद गज़नी द्वारा ‘भारत की समृद्धि, आस्था और संस्कृति के प्रतीक’ के इस पवित्र मंदिर पर अनेकोनेक आक्रमण किये । उसके द्वारा बार-बार किए गए अपवित्रता के कृत्य भारतीय इतिहास का एक भयावह अध्याय हैं ।

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Somnath Temple, Gujarat
Somnath Temple, Gujarat

भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 11 मई, 1951 को सोमनाथ मंदिर में सोमनाथ लिङ्ग की प्रतिष्ठा के अवसर पर यह भाषण दिया था । उल्लेखनीय है कि उन्होंने भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की सलाह के विरुद्ध जाकर यह निमंत्रण स्वीकार किया था ।

डॉ. प्रसाद ने अपने संबोधन में पुनर्निर्माण के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल के अमूल्य योगदान की प्रशंसा की और न केवल भारत और हिंदुओं के लिए सोमनाथ के अद्वितीय महत्व को रेखांकित किया, बल्कि भारत के बहुलवाद और धार्मिक सहिष्णुता के उस शाश्वत संदेश पर भी बल दिया, जो वेदों से लेकर समकालीन समय तक गुंजायमान है (एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति)। उनके लिए, सोमनाथ का पुनर्निर्माण और उसकी महिमा को पुनः जीवंत करना अतीत में लौटने का प्रयास नहीं था, बल्कि आस्था का अटूट  प्रतीक था और यह घोषणा थी कि संसार में कोई भी व्यक्ति या कोई भी शक्ति उस वस्तु को नष्ट नहीं कर सकती, जिसके लिए लोगों के हृदय में असीम आस्था और प्रेम है ।

उन्होंने सभी भारतीयों अंत में यह भी याद दिलाया कि सोमनाथ समृद्धि का मंदिर है और इसका निर्माण उसी दिन पूर्ण माना जाएगा जब भारत के समृद्धि मंदिर का निर्माण हो जाएगा ।

यह भाषण मैनेजर, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया प्रेस, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित ‘भारत के राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के भाषण’ से उद्धरित किया  गया है । संपादक ने केवल महत्वपूर्ण भागों पर विशेष बल दिया है ताकि पाठकों का ध्यान उस ओर आकर्षित हो सके । इस विषय में हुए डॉ. प्रसाद और पंडित नेहरू के पत्राचार को https://nehruarchive.in/documents/to-rajendra-prasad-13-march-1951-xek2wg पर देखा जा सकता है ।

 ‘सोमनाथ – आस्था का प्रतीक’ – डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा दिया गया भाषण

बहनों और भाइयों,

हमारे शास्त्रों में श्री सोमनाथ जी को बारह ज्योतिर्लिङ्गों में से एक माना गया है, और इस लिये पुरातन काल में भारत की समृद्धि, श्रद्धा और संस्कृति का प्रतीक भगवान सोमनाथ का यह मन्दिर था, जिस के चरण विशाल सागर धोता था, जिस का उन्नत ललाट स्वर्ग को छूता था, और जिस के विराट कक्ष में श्रद्वालु जन भारत के विभिन्न प्रदेशों और प्रान्तों से एकत्रित हो कर भगवान शंकर के चरणों मे अपरिमित श्रद्धा और भक्ति और अक्षय धन-धान्य की भेंट चढाया करते थे; इस तरह यह भारत में श्रद्धा और धन का केन्द्र तथा भण्डार बना हुआ था । दूर दूर तक तथा देश देश में इस के अतुलनीय वैभव की ख्याति फैली हुई थी किन्तु दुर्भाग्यवश इस पर एक युग के पश्चात् बार बार विपत्ति पड़ी । यह टूटा । किन्तु जातीय श्रद्धा का वाह्य प्रतीक चाहे विध्वंस किया जा सके पर उस का स्त्रोत तो कभी टूट नही सकता। यही कारण है कि सब विपत्तियाँ पड़ने पर भी भारत के लोगों के हृदय में भगवान सोमानाथ के इस मन्दिर के प्रति श्रद्धा बनी रही है और उन का यह स्वप्न बराबर रहा कि वे इस मन्दिर की प्राण-प्रतिष्ठा पुन कर दें और समय समय पर वे ऐसा करते भी रहे और आज इस ऐतिहासिक मन्दिर के जीर्णोद्धार के पश्चात् इस के प्रांगण में भारत के कोने कोने से आये हुए अनेक नर नारियों का कलरव फिर सुनाई दे रहा है । हमें यह पुनीत अवसर देखने का सौभाग्य इस लिये प्राप्त हुआ है कि जिस प्रकार भगवान विष्णु के नाभिकमल में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा वास करते हैं, उसी प्रकार मानव के हृदय में भी सृजनात्मक शक्ति और श्रद्धा सर्वदा वास करती है और वह सब शस्त्रास्त्रों से, सब सेनाओं से और सब सम्राटों से अधिक शक्तिशाली होती है । सोमनाथ का यह मन्दिर आज फिर अपना मस्तक ऊंचा कर के संसार के सामने यह घोषित कर रहा है कि जिसे जनता प्यार करती है, जिस के लिये जनता के हृदय में अक्षय श्रद्धा और स्नेह है, उसे संसार में कोई भी मिटा नहीं सकता । आज इस मन्दिर की प्राण-प्रतिष्ठा पुनः हो रही है और जब तक इस का आधार जनता के हृदय में बना रहेगा, तब तक यह मन्दिर अमर रहेगा ।

इस पुनीत, पावन और ऐतिहासिक अवसर पर हम सब के लिए यह उचित है  कि हम धर्म के इस महान तत्व को समझ लें कि भगवान की, सत्य की झांकी पाने के लिए कोई एक ही मार्ग मनुष्य के लिए अनिवार्य नहीं है वरन यदि श्रद्धा पूर्वक और लगन से मनुष्य जन जीवन की सेवा करने के लिये तत्पर होता है, और यदि वह अपने जीवन को संसार में स्नेह और सौन्दर्य का साम्राज्य स्थापित करने के लिये उत्सर्ग करता है तो फिर चाहे वह किसी ढंग से भगवान की पूजा क्यों न करे, उस को भगवान और सत्य की झांकी अवश्य मिल जाती है । हमारे प्राचीन ऋषियों ने इस तथ्य को पहचाना था और मनुष्य जाति के सामने इस को रखा था । वैदिक काल में ही इस बात की  साग्रह घोषणा कर दी गई थी कि वह एक है, किन्तु मनीषी लोग उस का वर्णन बहुत प्रकार से करते हैं । इसी प्रकार महाभारत में भी यह कहा गया था कि जिस प्रकार सब नदियां समुद्र ही में मिल जाती हैं, उसी प्रकार विभिन्न धर्म भी भगवान के पास ही मनुष्य को पहुंचा देते हैं ।  दुर्भाग्यवश धर्म और जीवन के इस तथ्य को विभिन्न युगों और विभिन्न जातियों में ठीक ठीक नही अपनाया गया और इसी कारण धर्म के नाम पर देशों और विभिन्न जातियों में अत्यन्त विनाशकारी और वीभत्स संघर्ष और धार्मिक युद्ध हुए ।  धार्मिक असहिष्णुता से सिवाय विद्वेष और अनाचार बढ़ने के अतिरिक्त और कोई फल नही होता है – यही इतिहास की शिक्षा है और इस को हम सब को गांठ बांध कर रखना चाहिए ।  हमारे देश में इस बात की आज विशेष आवश्यकता है कि हम में से प्रत्येक यह समझ ले कि हमारे देश में जितने सम्प्रदाय और समुदाय हैं, उन सब के प्रति हमें समता और आदर का व्यवहार करना है । क्यों कि ऐसा करने में ही हमारी सारी जाति और देश का तथा प्रत्येक व्यक्ति का कल्याण निहित है । इसी विश्वास और श्रद्धा के कारण हमारे भारतीय संघ ने धर्मनिरपेक्षता की नीति अपनायी है, और इस बात का आश्वासन दिया है कि इस देश में बसने वाले प्रत्येक सम्प्रदाय के लोगों को राज्य की ओर से एक समान सुविधायें प्राप्त होंगी । इसी नीति के अनुसार मेरी श्रद्धा और भक्ति सभी धर्मों के प्रति रहती है । यद्यपि में विश्वास और अपनी दिनचर्या में सनातनी हिन्दू हूँ और साधारणतः उसी धर्म की रीति से भगवान की उपासना और अर्चना करता हूँ, तथापि में यह भी मानता हूँ  कि अन्य धर्मावलम्बी अपनी रीति से भगवान की पूजा कर उस को पा सकते हैं और इसी लिये सभी धर्मों के पवित्र स्थानों के प्रति मैं केवल आदर का ही भाव नहीं रखता हूँ वरन् अवसर पा कर उस आदर को व्यक्त करने में भी कभी नहीं हिचकता । मौका मिलने पर मैं दरगाह और मस्जिद, गिर्जाघर और गुरुद्वारे में भी उसी श्रद्धा के साथ जाता हूँ जिस से कि मैं अपने मन्दिरों में जाता हूँ । आज का यह उत्सव भी इसी नीति की सत्यता को पुष्ट करता है । आज यह स्पष्ट है कि धार्मिक असहिष्णुता की भीति असफल सिद्ध हुई है और होती रहेगी । साथ ही हमें यह भी समझ लेना चाहिये कि इतिहास की टूटी हुई लड़ी को जोड़ने का अर्थ यह नहीं है और न हो सकता है कि हम इस बात का प्रयास करें कि वे सब मानसिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक अवस्थायें यहां फिर स्थापित हो जायें जो इतिहास के गत युग में यहां वर्तमान थीं । मानव के लिये यह तो सम्भव है कि वह पृथ्वीतल पर पिछले स्थान पर लौट सके किन्तु यह सम्भव नहीं कि वह विगत घड़ी के पास लौट जाये । कालक्षेत्र में तो उस को निरंतर आगे ही बढ़ना होता है । हाँ वह पीछे दृष्टि डाल कर आगे के लिये प्रकाश और ज्योति पा सकता है । अतः आज के उत्सव का यह अर्थ न तो है और न हो सकता है कि हम विलुप्त राजनैतिक और सामाजिक युग की पुनः स्थापना करना चाहते हैं, और न इस का यह अर्थ है कि हम उस मानसिक और शारीरिक घाव को फिर खोलना चाहते है जो शताब्दियों के व्यतीत होने के कारण बहुत कुछ भर या ढक चुका है । हमारा ध्येय पुरातन इतिहास के अन्याय को दूर करना नहीं है वरन् केवल यही है कि हम आज अपनी उस आस्था, उस विश्वास और उस श्रद्धा के प्रति अपनी लगन फिर से प्रकट करे जिस आस्था, या विश्वास पर अनन्त काल से हमारा धर्म स्थापित रहा है और हम फिर यह दुहाई कर दें कि धार्मिक जीवन का सर्वोपरि सत्य यही है कि प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक जाति को वह पूर्ण स्वतन्त्रता  और वे सुविधायें प्राप्त हों जिन में कि वह अपनी अनुभूति और अपनी नैसर्गिक बुद्धि के अनुसार, अपने जीवन का चरम उत्कर्ष प्राप्त कर सके और वह सत्य है पूर्ण धार्मिक सहिष्णुता ।

इस पुनीत अवसर पर हम सब के लिये यह उचित है कि हम आज इस बात का व्रत लें कि जिस प्रकार हम ने आज अपनी ऐतिहासिक श्रद्धा के इस प्रतीक में फिर से प्राण- प्रतिष्ठा की है, उसी प्रकार हम अपने देश के जन साधारण के उस समृद्धि मन्दिर में भी प्राण- प्रतिष्ठा पूरी लगन से करेंगे जिस समृद्धि मन्दिर का एक चिन्ह सोमनाथ का पुरातन मन्दिर था। उस ऐतिहासिक काल में हमारा देश सभ्य जगत का औद्योगिक केन्द्र था । यहां के बने हुए माल से लदे हुए कारवां दूर दूर देशो को जाते थे । और संसार का चांदी सोना इस देश में अत्यधिक मात्रा में खिचा चला आता था । हमारा निर्यात उस युग में बहुत या और आयात बहुत कम । इस लिये भारत उस युग में स्वर्ण और चांदी का भण्डार बना हुआ था । आज जिस प्रकार समृद्ध देशो के बैंकों के तहखानों में संसार का स्वर्ण पर्याप्त मात्रा में पड़ा रहता है, उसी प्रकार शताब्दियों पूर्व हमारे देश में संसार के स्वर्ण का अधिक भाग हमारे देवस्थानों में होता था । मैं समझता हूँ कि भगवान सोमनाथ के मन्दिर का पुनर्निर्माण उसी दिन पूरा होगा जिस दिन न केवल इस प्रस्तर की बुनियाद पर यह भव्य भवन खड़ा हो गया होगा, वरन् भारत की उस समृद्धि का भी भवन तैयार हो गया होगा जिस का प्रतीक वह पुरातन सोमनाथ का मन्दिर था । साथ ही सोमनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण तब तक भी मेरी समझ में पूरा नही होगा जब तक कि इस देश की संस्कृति का स्तर इतना ऊँचा न हो जाये कि यदि कोई वर्तमान अलबरूनी हमारी वर्तमान स्थिति को देखे तो हमारी संस्कृति के बारे में आज की दुनिया के मुकाबले में वही भाव प्रकट करे जो लगभग एक सहस्त्र वर्ष पूर्व उस समय के भारत के सम्बन्ध मे अलबरूनी ने प्रकट किये थे ।

नव निर्माण का यह यज्ञ स्वर्गीय सरदार वल्लभभाई पटेल ने आरम्भ किया था । भारत की विच्छिन्न एकता को पुनः एक सूत्र और अखण्ड करने में उन का निर्णायक हाथ था ।  और उन के हृदय में यह आकांक्षा उत्पन्न हुई थी कि नव निर्माण के प्रतीक स्वरूप भारत की पुरातन श्रद्धा का यह प्रतीक फिर से निर्मित किया जाये । वह स्वप्न भगवान की कृपा से आज एक सीमा तक पूरा हो गया है किन्तु वह पूर्ण रूपेण उसी समय पूरा हो सकेगा जब भारत के जन जीवन का वैसा ही सुन्दर मन्दिर बन गया होगा जैसा यह भगवान का मन्दिर है । जय भारत ।

टिप्पणी:

सोमनाथ मंदिर और उसके इतिहास लेखन के बारे में अधिक जानकारी के लिए, पाठक निम्नलिखित पुस्तकों का उपयोग कर सकते हैं:

  • Munshi, Kanaiyalal Maneklal. Somnath, the Shrine Eternal: Souvenir Published on the Occasion of the Installation Ceremony of the Linga in the New Somanatha Temple on May 11, 1951. 1951.
  • Thapar, Romila. Somanatha: The Many Voices of a History. Penguin Books India, 2008.

Garima Chaudhry - Founder and Editor - CulturalSamvaad.com

Garima Chaudhry

Garima Chaudhry is the Founder and Editor of Cultural Samvaad and Founder and Managing Partner of Hiranya Growth Partners LLP, a boutique consulting and content advisory firm based in Mumbai.

A scholar-practitioner with deep roots in Indic Studies, Garima has been a visiting faculty member for over a decade at Mumbai University and KJ Somaiya Institute of Dharma Studies, among other institutions. She has taught diploma, graduate and post-graduate courses in Development of Religious Thought in India, Hindu Thought, Bhartiya Purakatha, Buddhism and Comparative Mythology. She regularly conducts immersive workshops on India's dharmic traditions, civilisational heritage, enduring values, stories and symbols for diverse cohorts across institutions and organisations.

Garima brings over 25 years of leadership experience across financial services, digital payments, eCommerce, education and media. She began her career as a TAS Officer with the Tata Group, working across functions and sectors including FMCG and Power. At Citibank, she held progressive leadership roles culminating as Head of Strategy, Citi South Asia — working with the CEO, South Asia and Asia Pacific office on near and long-term strategic initiatives. Garima earlier led the business team for Digital Marketing, ePayments and eCommerce across India, building one of the country's early digital payment platforms. As Director at Capital18 (Network18), she led investment transactions and managed portfolio companies across focus sectors. She also served as CEO of GreyCells18 (Topperlearning and Topper TV), where she turned around and scaled the company to a 150-member team and built one of India's foremost supplementary education platforms.

Garima holds an MBA from XLRI Jamshedpur and a Bachelor's degree in Economics and Statistics from DAV College, Kanpur.Her scholarly interest in India's ancient संस्कृति — culture — and her conviction that a native idiom rooted in India's own ethos is essential to equitable growth and sustainable change, is the founding impulse behind Cultural Samvaad.

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