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सहस्राब्दियों से महान योद्धा देवी दुर्गा की अनेकानेक कथायें, भारतीयों एवं हिन्दुओं को मोहित, प्रेरित और शिक्षित करती आयी हैं । ये कथायें पुराणों और आगमों सहित अनेक ग्रन्थों में वर्णित हैं । माँ दुर्गा की अद्भुत कथाओं में शुम्भ और निशुम्भ के संहार के आख्यान को विशेष स्थान प्राप्त है । इस कथा में हमें भयंकर किन्तु कल्याणमयी माँ काली तथा पराक्रमी मातृकाओं के प्राकट्य के प्रसंग भी प्राप्त होते हैं । सम्भवतः इस कथा का प्राचीनतम रूप, हमें मार्कण्डेय पुराण के एक अंश – दुर्गा सप्तशती अथवा देवी माहात्म्य में मिलता है । चण्डी पाठ के अध्याय ५ से अध्याय ११ में वर्णित, यह आख्यान इस ग्रन्थ का तीसरा अथवा उत्तर चरित्र है ।
दुर्गा सप्तशती हिन्दी में पढ़ें और देखें
यह ध्यान देने योग्य है कि सप्तशती में महान देवी के लिए दुर्गा, अम्बिका और चण्डिका नाम परस्पर एक-दूसरे के स्थान पर प्रयुक्त हैं । माँ काली के लिए काली और चामुण्डा दोनों नामों का प्रयोग भी हमें मिलता है । ये सभी नाम वर्तमान काल में भी प्रचलित हैं ।
मूल कथा – देवी अम्बिका, देवी काली, सप्त मातृका एवं शुम्भ-निशुम्भ और रक्तबीज का वध
पूर्व काल में देवताओं और असुरों के बीच घोर संग्राम हुआ । देवराज इन्द्र की सेना शुम्भ और निशुम्भ की शक्तिशाली सेना से परास्त हो गयी । शुम्भ और निशुम्भ ने देवताओं के सभी अधिकार छीन लिये एवं समस्त ब्रह्माण्ड पर राज करने लगे । पराजित तथा अधिकारहीन देवताओं ने कैलाश पर्वत पर जाकर माँ पार्वती से सहायता हेतु प्रार्थना की ।
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ॥
देवी को नमस्कार है । उन महादेवी को सर्वदा नमस्कार है जो सदा मंगलमयी हैं (शिवा हैं) । हम सदैव एवं नियमपूर्वक उन देवी का नमन करते हैं जो स्वयं प्रकृति हैं तथा कल्याणकारी हैं ।
दुर्गा सप्तशती ५.९
माता पार्वती ने देवताओं की रक्षा करने के लिये देवी अम्बिका का मनोहर रूप धारण किया और गिरिराज हिमालय पर निवास करने लगीं । एक दिन, चण्ड और मुण्ड नाम के दो असुरों ने देवी दुर्गा के इस परम तेजस्वी रूप को देखा । वे तुरन्त अपने स्वामी शुम्भ और निशुम्भ के पास गये, देवी के आकर्षक रूप का गुणगान किया तथा अपने सामर्थ्यवान राजाओं को उस दिव्य देवी को अपने अधीन करने के लिये उत्तेजित किया ।
शुम्भ और निशुम्भ ने सुग्रीव नाम के एक बुद्धिमान दैत्य को दूत बनाकर देवी के पास भेजा जिससे वह उस उत्तम स्त्री को उनके महल में आने का आमन्त्रण दे सके तथा दोनों में से किसी एक भाई से विवाह करने के लिये सहमत कर सके । देवी अम्बिका ने शुम्भ और निशुम्भ का प्रस्ताव यह कह कर ठुकरा दिया कि उन्होंने यह प्रण लिया है कि वे केवल उसी से विवाह करेंगी जो उन्हें युद्ध में पराजित करेगा । जब उन दोनों अहंकारी भाइयों को पता चला कि एक साधारण स्त्री ने उनके परिणय के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है, तो उनके क्रोध की सीमा न रही ।
उन्होंने तुरन्त अपने वीर सेनापति धूम्रलोचन को बुलाया और उसे अपनी विशाल सेना के साथ जाकर देवी का बलपूर्वक हरण कर, वहाँ लाने का आदेश दिया । धूम्रलोचन देवी अम्बिका के समक्ष एक पल भी नहीं टिक सका । उनके ‘हुं’ शब्द के उच्चारण मात्र से ही वह भस्म हो गया । क्रोधित देवी और उनके विकराल वाहन ने कुछ ही क्षणों में शेष असुर सेना का संहार कर दिया ।
धूम्रलोचन की हार से स्तब्ध होकर, शुम्भ और निशुम्भ ने अम्बिका देवी से युद्ध करने के लिये चण्ड और मुण्ड के नेतृत्व में एक और विशाल सेना भेजी । वे मूर्ख असुर, देवी को बंदी बनाने हेतु, उनकी ओर दौड़े । क्रोध से देवी का मुख काला पड़ गया और उनके माथे से विकरालमुखी कालिका देवी प्रकट हुयीं । माँ काली युद्धभूमि में कूद पड़ीं और सम्पूर्ण असुर सेना को मार गिराया । उन्होंने कुछ असुरों को निगल लिया, कुछ को कुचल दिया और शेष असुरों को बुरी तरह घायल कर दिया । क्रुद्ध चण्ड और मुण्ड ने उन पर अनगिनत बाणों और अन्य अस्त्र-शस्त्रों से हमला किया । तदनन्तर, रोष से भरी, रौद्र रूप धारण कर, देवी कालिका ने चण्ड का शीश अपनी चमकती हुयी तलवार से काट डाला । मुण्ड का अन्त भी उन्हीं के हाथों से हुआ । विजयी माँ काली ने चण्ड और मुण्ड के मस्तक देवी चण्डिका को अर्पित किये । तब से वे संसार में चामुण्डा के नाम से प्रसिद्ध हो गयीं ।
प्रतिशोध लेने की भावना से ओत-प्रोत, शुम्भ और निशुम्भ ने अपनी सम्पूर्ण सेना को देवी अम्बिका से युद्ध करने हेतु कूच करने का आदेश दिया । इसी बीच, देवताओं ने अपनी शक्तियों का आवाहन किया । असीमित बल और पराक्रम से सम्पन्न, ये भव्य एवं निडर मातृकायें – ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही और ऐन्द्री, रणभूमि में चण्डिका एवं चामुण्डा के साथ युद्ध करने हेतु तत्पर हो गयीं । देवी चण्डिका ने निरर्थक रक्तपात को रोकने हेतु एक अन्तिम प्रयास किया । उन्होंने भगवान शिव को शान्ति दूत बनाकर शुम्भ और निशुम्भ के पास भेजा परन्तु मदान्ध होकर उन भाइयों ने देवी अम्बिका अर्थात शिवदूती का प्रस्ताव ठुकरा दिया ।

तदनन्तर असुरों एवं मातृकाओं का घनघोर संग्राम हुआ । जब असुर लड़खड़ाने लगे, तो रक्तबीज नामक एक भयंकर दानव आगे आया । मातृकाओं ने अपने प्रहार और प्रचण्ड कर दिये परन्तु रक्तबीज कोई साधारण दानव नहीं था । जैसे ही उसके रक्त की एक भी बूँद पृथ्वी पर गिरती थी, वैसे ही उसी के समान एक और भयानक एवं विशाल दानव उत्पन्न हो जाता था । देखते ही देखते, सम्पूर्ण रणभूमि रक्तबीज रूपी दानवों से भर गयी । यह वीभत्स दृश्य देखकर देवी चामुण्डा ने अपनी जिह्वा बहुत लम्बी फैला ली तथा माँ चण्डिका रक्तबीज पर निरन्तर आघात करने लगीं । उस विशाल दानव के रक्त की हर बूँद माँ काली की जिह्वा पर गिरने लगी । जैसे ही गिरे हुये रक्त बिन्दु से कोई भी दैत्य प्रकट होता था, वैसे ही विकराल काली तुरन्त उसको अपना ग्रास बना लेती थीं । धीरे-धीरे रक्तबीज के शरीर से रक्त क्षीण हो गया एवं उस भयानक दानव का अन्त हो गया । उसके अन्त से जहाँ एक ओर मातृगण हर्षित हो उठीं एवं देवताओं ने राहत की साँस ली, वहीं दूसरी ओर असुर राजा और क्रुद्ध हो गये ।
उन्होंने देवी और मातृकाओं पर भीषण आक्रमण कर दिया । चारों ओर भयानक स्वर गूँजने लगे और तबाही मच गयी । युद्ध की समाप्ति अब समीप थी । निशुम्भ और चण्डिका के बीच घोर संग्राम हुआ । अंततः, देवी ने अपने तीव्र शूल से उसका हृदय छलनी कर दिया । निशुम्भ की छाती से एक और महापराक्रमी दैत्य उत्पन्न हुआ, जिसे भी उग्र देवी ने अपने देदीप्यमान खड्ग से मार गिराया । इस प्रकार भयानक निशुम्भ का अन्त हो गया ।

अपने प्रिय भ्राता की मृत्यु से शोकाकुल शुम्भ ने देवी अम्बिका को मातृकाओं के अवलम्ब के बिना, अकेले ही युद्ध करने की चुनौती दी । देवी ने उसकी चुनौती स्वीकार कर ली । परिणामतः, समस्त मातृकायें, जो वास्तव में आदिशक्ति का ही रूप थीं, माँ अम्बिका में विलीन हो गयीं । देवी और असुरराज शुम्भ के बीच भयंकर द्वन्द्व युद्ध हुआ । उन्होंने धरती और गगन दोनों में संग्राम किया । उन्होंने घातक हथियारों से रण किया और मल्ल युद्ध भी किया । अन्त में, दुर्गा ने अपने तीक्ष्ण शूल से शुम्भ का वध कर दिया और उसका निर्जीव शरीर भयानक ध्वनि के साथ पृथ्वी पर आ गिरा । असुरों का विध्वंस हो गया और ब्रह्माण्ड का संतुलन पुनः स्थापित हो गया ।
प्रफुल्लित एवं भयमुक्त देवताओं ने माँ चण्डिका, माँ काली तथा अन्य मातृकाओं का वन्दन कर, उनके प्रति अपना असीम आभार व्यक्त किया । उन्होंने देवी अर्थात सर्वोच्च शक्ति की स्तुति की एवं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की सृष्टि, पालन और विनाश के मूल कारण के रूप में उनको नमन किया । देवताओं ने विश्व की सभी स्त्रियों को उन्हीं का प्रतिरूप भी बताया । प्रसन्न होकर सनातन देवी ने उन्हें आशीर्वाद दिया और यह वचन भी दिया कि सृष्टि में धर्म एवं ऋत की स्थापना करने हेतु, वे हर युग और हर काल में अवतरित होती रहेंगी ।
इस कथा से हमें क्या शिक्षा मिलती है ?
इस बहुस्तरीय आख्यान की बुद्धिजीवियों ने अनेक प्रकार से व्याख्या की है । सम्भवतः, एक ही कथा के विभिन्न पहलुओं एवं प्रतीकों की अलग-अलग रूप से विवेचना ही भारतीय पुराकथाओं के आकर्षण और कालातीतता का स्रोत है ।
वास्तव में रक्तबीज रूपी दैत्य हम सबके भीतर विद्यमान है । वह हमारी स्वयं को पोषित करने वाली नकारात्मक प्रवृत्तियों जैसे हमारे क्रोध, हमारे अहंकार एवं हमारी घृणा के समान है । रक्तबीज के ही समकक्ष यदि चित्त की इन अशुद्धियों पर हम समय रहते अंकुश नहीं लगाते हैं, तो वे हमारे विनाश का कारण बनती हैं। शुम्भ और निशुम्भ हमारे असंयमित लोभ एवं हमारे दम्भ के प्रतीकात्मक रूप हैं और जिस प्रकार उन दानवों की नियति, उनका संहार थी, उसी प्रकार हम लोभी जनों का दुखद अन्त भी सर्वथा निर्धारित है ।
विभिन्न नामों से जानी जाने वाली और विभिन्न रूपों में पूजित, सभी देवियाँ वास्तव में एक ही आदिशक्ति की विभूतियाँ हैं ।
एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा ।
पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः ॥
मैं अकेली ही हूँ । इस संसार में मेरे सिवा दूसरा कोई नहीं है । देखो, ये मेरी ही विभूतियाँ हैं, अतः मुझ में ही प्रवेश कर रही हैं ।
दुर्गा सप्तशती १०.५
यह कथा अनेक प्रकार से नारी सशक्तिकरण की ओर इंगित करती है । देवी पूर्णतः स्वतन्त्र रूप से अपने निर्णय लेती हैं । सभी देवियाँ हर संग्राम एवं हर युद्ध अकेले ही लड़ने एवं जीतने में सक्षम हैं । मातृकाओं को न तो कभी पराधीन किया गया था और न ही कभी पराधीन किया जा सकता है ।
सनातन पुराकथा परम्परा के कई अन्य आख्यानों में भी सहृदय एवं विद्वान पाठकों को इन मूल भावों एवं विचारों का नाना प्रकार से चित्रण मिलेगा ।
वैसे तो आदिशक्ति दुर्गा अव्यक्त एवं अजन्मा हैं, परन्तु जब भी उनके भक्तगण, उनकी सहायता हेतु उनकी प्रार्थना करते हैं, तब वे अगणित रूपों में प्रकट होती हैं । आदिशक्ति, अजेय माँ दुर्गा, इस ब्रह्माण्ड पर सदैव अपनी अनुकम्पा बनाये रखें ।

देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य।
प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य॥
शरणागतों की पीड़ा दूर करने वाली देवि! हम पर प्रसन्न होओ । सम्पूर्ण जगत की माता ! प्रसन्न होओ । विश्वेश्वरि! विश्व की रक्षा करो । देवि! तुम्हीं सम्पूर्ण चराचर ब्रह्माण्ड की अधीश्वरी हो ।
दुर्गा सप्तशती ११.३






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